“ध्यान” एक ऐसी पुस्तक है जो ध्यान के गहरे अर्थ और उसके महत्व पर प्रकाश डालती है. यह पुस्तक सिखाती है कि ध्यान कोई नियमों या आज्ञापालन का विषय नहीं है, बल्कि यह उच्चतम स्तर का अनुशासन है जो सतत सजगता से उत्पन्न होता है. यह सजगता न केवल बाहरी दुनिया के प्रति, बल्कि अपने भीतर की अवस्था के प्रति भी होनी चाहिए.
लेखक के अनुसार, सही जीवनचर्या के बिना ध्यान केवल एक पलायन बन जाता है और उसका कोई मूल्य नहीं होता. सही जीवनचर्या का अर्थ सामाजिक नैतिकता का पालन करना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है ईर्ष्या, लोभ और सत्ता की लालसा से मुक्ति. ये भावनाएँ दुश्मनी और वैमनस्य को जन्म देती हैं. यह पुस्तक इस बात पर जोर देती है कि इन नकारात्मक भावनाओं से मुक्ति संकल्प या इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि आत्म-परिचय से मिलती है.
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